मणिकर्णिका घाट (Manikarnika ghat): बनारस की अनंत ज्वाला और मोक्ष का प्रतीक

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वाराणसी (Banaras/Kashi) विश्व की सबसे प्राचीन जीवित नगरी मानी जाती है। गंगा के किनारे बसा यह शहर केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता का जीवंत दस्तावेज़ है। यहाँ के असंख्य घाटों में मणिकर्णिका घाट (Manikarnika ghat) का स्थान सबसे विशिष्ट और रहस्यमयी है। यह घाट केवल एक साधारण स्थान नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के शाश्वत चक्र का प्रतीक है। यहाँ हर दिन सैकड़ों दाह-संस्कार होते हैं और यह विश्वास किया जाता है कि इस घाट पर होने वाले अंतिम संस्कार से आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

नाम और मिथक

मणिकर्णिका नाम के पीछे कई पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं।

  1. देवी सती की कथा: एक मान्यता के अनुसार, जब देवी सती ने यज्ञ में स्वयं को अग्नि को समर्पित किया, तो उनके शरीर के अंग विभिन्न स्थानों पर गिरे। कहा जाता है कि उनके कान की मणि (Mani) और कर्णिका (ear ornament) यहीं गिरी थी। इसी कारण इस स्थान का नाम मणिकर्णिका पड़ा।
  2. भगवान विष्णु और शिव की कथा: एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने तपस्या के समय अपने चक्र से पृथ्वी को खोदकर एक कुंड बनाया। इस दौरान उनके श्रम से निकला पसीना कुंड में भर गया। तभी भगवान शिव की मणिकर्णिका (कर्णफूल) उस कुंड में गिर गई। तभी से इस घाट को मणिकर्णिका कहा जाने लगा।

इन कथाओं से स्पष्ट है कि यह स्थान केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि पौराणिक धरोहर के रूप में भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

मणिकर्णिका घाट का उल्लेख प्राचीन पुराणों और यात्रावृत्तांतों में मिलता है। मध्यकालीन ग्रंथों में भी इसका उल्लेख है कि काशी के इस घाट पर निरंतर अग्नि जलती रहती है।

मुगल काल में जब वाराणसी पर कठिन समय आया, तब भी मणिकर्णिका की चिता बुझी नहीं। इतिहासकारों के अनुसार, कई विदेशी यात्री जैसे जेम्स प्रिंसेप और अन्य यूरोपीय दूतों ने अपने लेखन में इस घाट का विस्तार से वर्णन किया है। उनके अनुसार, यह घाट “Eternal burning ghat” के नाम से जाना जाने लगा, क्योंकि यहाँ कभी भी दाह संस्कार रुकते नहीं।

मोक्ष की अवधारणा

हिन्दू धर्म में मृत्यु के बाद आत्मा का पुनर्जन्म होना माना जाता है। यह जन्म-मरण का चक्र तब तक चलता रहता है जब तक आत्मा मोक्ष (salvation/liberation) प्राप्त न कर ले।

मणिकर्णिका घाट को “मोक्षदायिनी” माना गया है। विश्वास है कि यहाँ पर दाह संस्कार कराने से आत्मा इस चक्र से मुक्त हो जाती है और सीधा भगवान शिव के चरणों में स्थान पाती है। इसी कारण भारत के विभिन्न हिस्सों से लोग अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार कराने के लिए बनारस आते हैं।

निरंतर जलती चिता

मणिकर्णिका घाट की सबसे बड़ी विशेषता है कि यहाँ चिता कभी बुझती नहीं। माना जाता है कि स्वयं भगवान शिव ने यहाँ की अग्नि प्रज्वलित की थी और यह अनादि काल से लगातार जल रही है।

दिन हो या रात, वर्षा हो या गर्मी — हर समय यहाँ लकड़ियों की चिताएँ सुलगती रहती हैं। आँकड़ों के अनुसार, प्रतिदिन 80 से 100 शवों का अंतिम संस्कार यहाँ होता है। इस निरंतरता के कारण यह घाट “अनंत ज्वाला” का प्रतीक बन चुका है।

दाह संस्कार की परंपरा

यहाँ अंतिम संस्कार की एक विशेष परंपरा है। शव को लकड़ी की चिता पर रखा जाता है, घी, कपूर और हवन सामग्री के साथ उसे अग्नि दी जाती है। पहले मृतक को गंगा जल से स्नान कराना और मुख में गंगा जल की बूंदें डालना अनिवार्य माना जाता है।

सबसे नज़दीकी परिजन (मुखाग्नि देने वाला) लकड़ी की चिता के चारों ओर परिक्रमा करता है और फिर चिता को अग्नि देता है। यह दृश्य गंभीर, भावुक और साथ ही दार्शनिक दृष्टि से गहन होता है।

डोम समुदाय और उनकी भूमिका

मणिकर्णिका घाट का संचालन मुख्य रूप से डोम (Dom) समुदाय के हाथ में है। इन्हें यहाँ की चिता और अग्नि के रक्षक माना जाता है।

  • डोम परिवार लकड़ी की आपूर्ति करता है।
  • वे चिता सजाते हैं और दाह संस्कार की व्यवस्था करते हैं।
  • माना जाता है कि उनकी अनुमति और सहभागिता के बिना यहाँ अंतिम संस्कार नहीं हो सकता।

डोम राजा को इस परंपरा का सर्वोच्च संरक्षक माना जाता है। यद्यपि समाज में यह समुदाय आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर रहा है, लेकिन मणिकर्णिका घाट पर उनकी भूमिका अपरिहार्य है।

साहित्य और कला में मणिकर्णिका घाट

भारतीय साहित्य और कला में मणिकर्णिका घाट का कई बार उल्लेख मिलता है। कबीरदास और तुलसीदास जैसे संत कवियों ने मृत्यु की अनिवार्यता और मोक्ष की अवधारणा को अपने पदों में पिरोया।

फोटोग्राफ़ी और डॉक्यूमेंट्री की दुनिया में भी यह घाट आकर्षण का केंद्र रहा है। विदेशी लेखकों और फिल्म निर्माताओं ने इस स्थान को “Life and Death’s Crossroad” कहकर चित्रित किया है।

सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टिकोण

मणिकर्णिका घाट हमें जीवन के उस सत्य से अवगत कराता है जिसे अक्सर हम भूल जाते हैं — मृत्यु। यहाँ मृत्यु एक डरावना अनुभव नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक और अंतिम पड़ाव माना जाता है।

लोग मानते हैं कि यहाँ मृत्यु का दृश्य देखकर मनुष्य का अहंकार टूटता है और वह जीवन की क्षणभंगुरता को समझ पाता है। यही दर्शन काशी की संस्कृति को और भी गहन बनाता है।

यात्रियों और पर्यटकों का अनुभव

मणिकर्णिका घाट पर हर साल हजारों देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं।

  • विदेशी यात्रियों के लिए यह एक चौंकाने वाला अनुभव होता है। वे मृत्यु को इतनी खुलकर सामने देख हैरान होते हैं।
  • भारतीय यात्रियों के लिए यह आस्था और श्रद्धा का विषय है।
  • घाट के आसपास गली-कूचों में लकड़ी की दुकानों की कतारें, पूजा सामग्री की दुकानें और पुरोहितों के आवास मिलते हैं।

यात्रियों को अक्सर सलाह दी जाती है कि वे यहाँ फ़ोटोग्राफ़ी और वीडियो बनाने से पहले अनुमति अवश्य लें और मृतक परिवार की गोपनीयता का सम्मान करें।

मणिकर्णिका कुंड

घाट के पास स्थित मणिकर्णिका कुंड का भी विशेष महत्व है। माना जाता है कि यह वही कुंड है जो विष्णु जी ने बनाया था। आज भी यहाँ श्रद्धालु स्नान करते हैं और इसे पुण्यकारी मानते हैं।

वर्तमान स्थिति

आज के समय में भी मणिकर्णिका घाट उतना ही सक्रिय और जीवंत है जितना सदियों पहले था। आधुनिकता ने काशी के कई पहलुओं को बदला है, लेकिन इस घाट की परंपरा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

सरकारी और निजी प्रयासों से यहाँ स्वच्छता और व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने की कोशिश की जा रही है। फिर भी, यहाँ की भीड़, धुआँ और लकड़ियों की कतारें इसे एक अलग ही दुनिया बना देती हैं।

मणिकर्णिका घाट (Manikarnika ghat) जीवन और मृत्यु के बीच की सबसे सशक्त कड़ी है। यह केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक दार्शनिक अनुभव है जो हमें याद दिलाता है कि अंततः सबको इसी राह से गुज़रना है।

बनारस की आत्मा को समझना है तो मणिकर्णिका घाट की यात्रा आवश्यक है। यहाँ की ज्वाला हमें सिखाती है कि जीवन क्षणभंगुर है और सच्चा सुख तभी संभव है जब हम मृत्यु के सत्य को स्वीकार कर लें।


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